

Manoj Dutt, Sports Journalist and Cricket Commentator
नई सुबह की कहानी
ICC Women’s World Cup 2025 में जब पार्तिका रावल ने 308 रन बनाए, तो पूरा देश उनकी प्रतिभा और दृढ़ता की प्रशंसा कर रहा था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पार्तिका रावल ने अपने क्रिकेट के शुरुआती दिन कोच सरवन कुमार की देखरेख में बिताए थे। लगातार दस वर्षों तक वे Rohtak Road Gymkhana Ground, दिल्ली में अभ्यास करती रहीं — जहाँ उन्होंने रोज़ घंटों नेट्स में पसीना बहाया, मैच खेले और अपनी बल्लेबाज़ी को तराशा। दिल्ली के क्रिकेट में सरवन कुमार का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने न केवल पार्तिका को तकनीकी रूप से मज़बूत बनाया, बल्कि उनमें आत्मविश्वास और मैदान पर टिके रहने का जज़्बा भी भरा।

वही मैदान, जिसने पहले ईशांत शर्मा, हरषित राणा और अभिषेक शर्मा जैसे खिलाड़ियों को तैयार किया, आज पार्तिका रावल जैसी महिला क्रिकेटर की सफलता का प्रतीक बन चुका है। पिछले पाँच दशकों से क्रिकेट के मैदान में सक्रिय सरवन कुमार आज भी उसी समर्पण और निष्ठा से नई पीढ़ी की महिला क्रिकेटरों को गढ़ रहे हैं। वे कहते हैं —
“मुझे अब यही खुशी है कि बेटियाँ भी बल्ला उठा रही हैं और देश के लिए खेल रही हैं।”

सोनेट क्लब की शुरुआत
सरवन कुमार की कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटना होगा — जहाँ दो दोस्तों परमोद जैन और तारक सिन्हा के जुनून और दोस्ती ने इतिहास रचा।दिल्ली के कमला नगर में रहने वाले परमोद जैन और बिरला मिल्स के क्वार्टरों में रहने वाले तारक सिन्हा बचपन से अच्छे दोस्त थे। परमोद शक्ति नगर नंबर 2 स्कूल में पढ़ते थे, जबकि तारक बिरला स्कूल में। दोनों को क्रिकेट का गहरा शौक था और स्कूल के बाद वे अक्सर बिरला स्कूल के मैदान में साथ खेला करते थे। परमोद जैन के अनुसार, उनकी दोस्ती पूरी तरह निष्कपट और स्वार्थरहित थी। 1967–68 में दोनों ने DDCA (फिरोज़ शाह कोटला, अब अरुण जेटली स्टेडियम) में ट्रायल दिया, पर चयन नहीं हुआ। निराश होकर लौटते हुए रास्ते में उन्होंने सोचा — “जब कोई हमें मौका नहीं दे रहा, तो क्यों न हम खुद अपना क्लब बना लें?” उस समय परमोद जैन के पास केवल ₹15 थे। इन्हीं पैसों से उन्होंने एक बैट और एक कॉर्क की बॉल खरीदी और सड़क पर खेलना शुरू किया। यही वह क्षण था जब “सोनेट क्लब” की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे अभ्यास रोशनारा बाग़ में होने लगा, जहाँ मिट्टी पर रोज़ाना प्रैक्टिस होती थी।

1969 में दोनों ने 12वीं पास की —परमोद जैन का दाखिला पन्नालाल गिरधरलाल दयानंद एंग्लो-वैदिक (पी.जी.डी.ए.वी.) कॉलेज में हुआ और तारक सिन्हा ने घर की परिस्थितियों के कारण पटेल चेस्ट में दैनिक मजदूरी पर नौकरी शुरू की। उनके पिता उस समय बिरला मिल में Webbing Master थे। DAV कॉलेज में परमोद जैन ने स्पोर्ट्स सेक्रेटरी का चुनाव जीता और वहीं उनकी मुलाकात O. P. मल्होत्रा सर से हुई, जिन्होंने 1969 में कॉलेज जॉइन किया था। मल्होत्रा सर और परमोद जैन के बीच गहरा संबंध बना, और कॉलेज की किट से ही सोनेट क्लब की प्रैक्टिस शुरू हुई।

स्वर्गीय ओ. पी. मल्होत्रा, निदेशक, शारीरिक शिक्षा विभाग, डीएवी कॉलेज।
दोस्ती, संघर्ष और शुरुआत
उसी दौर में सरवन कुमार रोहतक रोड, दिल्ली में रहते थे। दिलचस्प बात यह थी कि अपने ही मोहल्ले की टीम में उन्हें खेलने का मौका नहीं मिलता था। पर हार मानना उनके स्वभाव में नहीं था। उन्होंने अपने उम्र के लड़कों की टीम बनाई और “Sunday to Sunday” मैच खेलने लगे। धीरे-धीरे उनकी टीम का नाम होने लगा। जून 1970 में उनकी टीम का मुकाबला हुआ Sonnet Club से — और सरवन की टीम विजयी रही। मैच के बाद तारक सिन्हा ने प्रस्ताव रखा -“क्यों न मिलकर टीम बनाएं और साथ में अभ्यास करें?” तब सोनेट क्लब की प्रैक्टिस रोशनारा बाग़ की मिट्टी वाली पिच पर होती थी, जहाँ विकेट के नाम पर बस एक पेड़ था। कुछ समय बाद सरवन कुमार ने तारक सिन्हा को करोल बाग़ के अजमल खां पार्क का मैदान दिखाया, और तय हुआ कि अब यहीं से क्लब की प्रैक्टिस होगी।

संघर्ष के दिन — मिट्टी, मेटिंग और साइकिल
समस्या यह थी कि पार्क में रोज़ शादी-ब्याह और अन्य कार्यक्रम होते थे, जिससे मिट्टी की पिच को संभालना कठिन था। समाधान निकला — एम.एम. गुप्ता (रोशनारा स्कूल के पी.टी.आई.) से मेटिंग ली गई। वो मेटिंग साइकिल पर रखकर दोनों अजमल खां पार्क ले जाते, जहाँ से सोननेट क्लब की असली यात्रा शुरू हुई। शाम को प्रैक्टिस के बाद सरवन मेटिंग अपने घर रख देते। दोनों साथ भोजन करते और फिर सरवन अपनी साइकिल पर तारक सिन्हा को बिरला मिल के क्वार्टर (अंबा सिनेमा के पीछे) छोड़ने जाते। यह सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि भाईचारे और समर्पण की मिसाल थी।

संघर्ष और स्थिरता का दौर
तारक सिन्हा उस समय पटेल चेस्ट, मॉरिस नगर में डेली वेजेस पर काम करते थे, पर क्लब के प्रति समर्पण के कारण उनकी नौकरी चली गई। अब दोनों बेरोज़गार थे — पर हिम्मत अटूट थी।जेब खाली थी, लेकिन सपने करोड़ों के थे। सरवन ने कुछ पैसे घर से लिए, कुछ भाइयों से,और किसी तरह सोननेट क्लब का खर्चा चलाया। धीरे-धीरे क्लब की पहचान बढ़ने लगी। DAV कॉलेज के इंटर-स्टाफ टूर्नामेंट में मल्होत्रा सर खेलते थे। इसी दौरान परमोद जैन ने तारक सिन्हा से उनकी मुलाकात कराई। मल्होत्रा सर ने उनकी कोचिंग क्षमता को पहचानाऔर तारक सिन्हा को DAV कॉलेज, लाजपत नगर में ₹5 प्रतिदिन के मानदेय पर कोचिंग का अवसर दिया। यहीं से सरवन कुमार और तारक सिन्हा ने मिलकर DAV कॉलेज क्रिकेट टीम को संभालना शुरू किया।दोनों रोज़ रोहतक रोड, करोल बाग से साइकिल पर लाजपत नगर जाते, टीम को प्रशिक्षित करते और फिर लौटकर सोनेट क्लब में अभ्यास करवाते। सरवन घर से खाना लाते, तारक को खिलाते और उन्हें साइकिल से घर छोड़ने जाते। यह दोस्ती, प्रेम और त्याग का अद्भुत संगम था।

सामने वाले बैठे हुए लोगों में भास्कर बाईं ओर से पहले हैं, दूसरे पर प्रमोद जैन हैं, प्रभाकर बाईं ओर से तीसरे हैं, सिन्हा बाईं ओर से चौथे हैं, साथ में सरवन कुमार हैं। अजय शर्मा दाईं ओर से चौथे खड़े हैं, साथ में मनु नायर हैं — ये सभी प्रसिद्ध पूर्व छात्र हैं।
DAV कॉलेज की ऐतिहासिक जीत
1972–73 में परमोद जैन, तारक सिन्हा और सरवन कुमार — इन तीनों ने मिलकर DAV कॉलेज की पिच तैयार की, जो आज भी उसी स्थान पर मौजूद है। हर साल मिट्टी बदली जाती है, लेकिन पिच का स्थान वही रहता है। वर्ष, 1974 में परमोद जैन अमेरिका चले गए, लेकिन 1979 में भारत लौटकर फिर से सोननेट क्लब और दिल्ली क्रिकेट से जुड़ गए। इसी दौरान एक ऐतिहासिक पल आया — DAV कॉलेज की टीम ने पहली बार दिल्ली यूनिवर्सिटी इंटर कॉलेज चैंपियनशिप जीती, जब उसने हिंदू कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज जैसी दिग्गज टीमों को हराया। यह जीत न केवल कॉलेज के लिए, बल्कि सोननेट क्लब की मेहनत और समर्पण का प्रतीक थी। सोनेट क्लब ने सबसे पहले स्काउटिंग, कोचिंग और प्लेयर सिलेक्शन का कॉन्सेप्ट दिया। तारक सिन्हा मुख्य रूप से कोचिंग का कार्य संभालते थे, सरवन कुमार स्काउटिंग और कोचिंग दोनों देखते थे, और परमोद जैन DDCA में प्लेयर सिलेक्शन का कार्य करते थे।



सोनेट क्लब की उड़ान और नई ऊँचाइयाँ
धीरे-धीरे सोनेट क्लब का नाम दिल्ली क्रिकेट में गूंजने लगा। सुरिंदर खन्ना भारत की टीम में पहुँचे, रमण लांबा, संजय भारद्वाज, भास्कर पिल्लै, कमल किशोर जैसे खिलाड़ी उभरे। इसी दौर में मनोज प्रभाकर, संजीव शर्मा, अतुल वासन और अजय शर्मा जैसे नाम राष्ट्रीय मंच पर पहुंचे — और सोननेट क्लब दिल्ली क्रिकेट की पहचान बन गया। DAV कॉलेज ने लगातार इंटर कॉलेज चैंपियनशिप जीतनी शुरू की। लेकिन 1984–85 के बाद हालात बदले —साथ काम करने का आनंद कम हुआ और सरवन कुमार ने अपना अलग कोचिंग सेंटर शुरू किया।


स्व. सुनील देव, उस समय बीसीसीआई के उपाध्यक्ष और डीडीसीए के खेल सचिव, सरवन कुमार और प्रमोद जैन के साथ
नया संघर्ष — और नई सुबह
1988 के आसपास सरवन कुमार ने रामजस स्कूल, आनंद पर्वत, दिल्ली में कोचिंग शुरू की। संसाधन सीमित थे, पर नीयत अटूट थी। वे खिलाड़ियों में अनुशासन, मेहनत और आत्मविश्वास भरते रहे। फिर भी सरवन की सोननेट क्लब के प्रति वफ़ादारी कभी नहीं टूटी। जो भी प्रतिभाशाली खिलाड़ी उन्हें मिलता, उसे वे सोननेट क्लब भेज देते। क्योंकि उनके लिए क्रिकेट कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि परिवार था। बाद में O. P. मल्होत्रा ने सरवन को DAV कॉलेज का फुल-टाइम कोच बनने का प्रस्ताव दिया।उन्होंने एक ही शर्त रखी — “मैं कोचिंग दूँगा, लेकिन कोई भी तारक सिन्हा के बारे में बुरा नहीं कहेगा।”यह उनके दिल में बसे आदर और रिश्ते की गहराई को दर्शाता था।


1998 के बाद — नई पीढ़ी के निर्माता
1998–99 में सरवन कुमार ने DDCA का Rohtak Road Gymkhana Club खरीदा, जहाँ से नई पीढ़ी तैयार होने लगी। जोगिंदर शर्मा, जो आगे चलकर 2007 T20 World Cup के हीरो बने, एक वर्ष तक सरवन के मार्गदर्शन में अभ्यास करते रहे। एक दिन उनका एक पुराना शिष्य एक लंबे लड़के को लेकर आया — “सर, इसे बॉलिंग कराओ।”वह लड़का आगे चलकर बना — ईशांत शर्मा, भारत का टेस्ट योद्धा। इसी मैदान से अभिषेक शर्मा, अंकुश बैन्स (वर्तमान में HP रणजी टीम के कप्तान), चेतन शर्मा (BCCI मैच रेफरी) और हरषित राणा जैसे खिलाड़ी भी सरवन से क्रिकेट सीख चुके हैं।

महिला क्रिकेट की नई सुबह
इसी मैदान पर सरवन कुमार ने महिला क्रिकेटरों को भी गढ़ना शुरू किया। पार्तिका रावल, जिन्होंने ICC Women’s World Cup 2025 में 308 रन बनाए, लगातार दस वर्षों तक RR Gymkhana में अभ्यास करती रहीं। वर्तमान में वे भारतीय रेलवे, दिल्ली में कार्यरत हैं, और दीप्ति ध्यानी (रेलवे टीम की कोच) के साथ प्रशिक्षण लेती हैं। उनके अलावा सिमरन, प्रिया मिश्रा (भारतीय महिला टीम) और पूजा महतो (नेपाल महिला टीम) ने भी सरवन के मार्गदर्शन में क्रिकेट सीखा। रोहतक रोड जिमखाना में लड़कियों के लिए क्रिकेट कोचिंग पूरी तरह निःशुल्क है। साथ ही, सरवन कुमार उन्हें यूनिफ़ॉर्म और क्रिकेट उपकरण भी मुफ़्त उपलब्ध कराते हैं। जो खिलाड़ी प्रतिभाशाली होती हैं, उन्हें भी बिना शुल्क के कोचिंग दी जाती है — ताकि आर्थिक स्थिति उनके खेल में बाधा न बने।

संबंधों और सहयोग की मिसाल
सोनेट क्लब केवल एक क्लब नहीं, बल्कि रिश्तों, त्याग और सहयोग की मिसाल था। परमोद जैन, जिन्होंने सोनेट क्लब की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, स्वयं एक उत्कृष्ट क्रिकेटर और DAV कॉलेज के छात्र थे। उन्होंने सरवन कुमार का साथ तन, मन और धन से दिया। उनका रिश्ता एक सगे भाई जैसा था और आज भी उतना ही अटूट है। सुरिंदर खन्ना, भास्कर पिल्लै और मनू नय्यर ने भी हर कदम पर सरवन का साथ निभाया। पूरे क्रिकेट जीवन में सरवन कुमार ने खेलने के लिए केवल दो बल्ले खरीदे — ₹300 में। वे दोनों बल्ले बाद में भास्कर पिल्लै ने ले लिए — जो उनके आपसी स्नेह और गहरे रिश्ते का प्रतीक था।





गंगा इंटरनेशनल स्कूल की भूमिका
इस सफर में गंगा इंटरनेशनल स्कूल, दिल्ली की भूमिका भी अहम रही। स्कूल के चेयरमैन, पूर्व सांसद सुशील गुप्ता ने सदैव सरवन कुमार का समर्थन किया। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था —“जो बच्चा टैलेंटेड है, उसकी फीस कभी बाधा नहीं बनेगी।”इस नीति के चलते कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को अवसर मिला, जिनकी क्रिकेट यात्रा सरवन कुमार के मार्गदर्शन में निखरी।

तारक सिन्हा की याद और अधूरा सम्मान
2018 में जब तारक सिन्हा को द्रोणाचार्य अवॉर्ड मिला, तो सरवन कुमार की आँखों में खुशी और गर्व दोनों थे।उन्होंने कहा —“उस दिन रोशनारा बाग़, घंटाघर, अजमल खां पार्कऔर वो साइकिल याद आ गई, जिस पर सपने लादकर मैदान तक जाते थे।”लेकिन 6 नवंबर 2021 को जब तारक सिन्हा का निधन हुआ, तो सरवन बोले — “ऐसा लगा जैसे मेरा एक हाथ कट गया हो।” भले ही रास्ते अलग हुए, पर प्यार, सम्मान और निष्ठा वही रही —जैसी 1970 में थी।

आज का दिन — संतोष, परिवार और विरासत
आज सरवन कुमार की तीन बेटियाँ हैं — एक B.Tech, MCA, दूसरी PhD, और तीसरी TCS में कार्यरत हैं। वे कहते हैं —“क्रिकेट ने मुझे सब कुछ दिया, और मैंने क्रिकेट को अपनी पूरी ज़िंदगी।” उन्होंने 55 साल मैदान में बिताए — एक गेंद, एक बल्ला और उस दौर में एक साइकिल के सहारे।

एक सच्चे द्रोणाचार्य की प्रतीक्षा
जब हम सरवन कुमार के योगदान, उनके शिष्यों और उनकी उपलब्धियों को देखते हैं, तो एक सवाल उठता है —“ऐसे गुरु को अभी तक द्रोणाचार्य अवॉर्ड से क्यों नहीं नवाज़ा गया?” शायद जिस दिन यह सम्मान उन्हें मिलेगा, उस दिन भारतीय क्रिकेट अपने एक सच्चे सिपाही का कर्ज़ उतारेगा — जिसने बिना किसी स्वार्थ के पीढ़ियाँ गढ़ीं, मिट्टी से लेकर मैदान तक हर कदम पर क्रिकेट को जिया। सरवन कुमार ने न केवल दिल्ली, बल्कि भारतीय क्रिकेट की जड़ें मज़बूत की हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा कोच वही है, जो दूसरों के सपनों को अपना लक्ष्य बना ले। वे न केवल एक कोच हैं, बल्कि एक संस्था, एक प्रेरणा और एक युग हैं। अब समय आ गया है कि भारतीय क्रिकेटअपने इस सच्चे द्रोणाचार्य को वह सम्मान दे, जिसके वे निस्संदेह हकदार हैं। क्योंकि सरवन कुमार ने सिखाया —“क्रिकेट सिर्फ बल्ले और गेंद का खेल नहीं, यह रिश्तों, सम्मान और निष्ठा का धर्म है।”